कबीरधाम में ट्रांसफर नीति का 'जनाज़ा'! कुर्सी से ऐसा फेविकोल का जोड़ कि 'नियम' बौने, मेहरबान तंत्र मौन!

 



कबीरधाम। 
क्या छत्तीसगढ़ शासन की ट्रांसफर पॉलिसी सिर्फ छोटे कर्मचारियों को डराने के लिए है? क्या कबीरधाम का महिला एवं बाल विकास विभाग किसी अधिकारी की निजी जागीर बन चुका है? सूचना के अधिकार (RTI) से निकले एक सरकारी कागज़ ने ज़िला प्रशासन से लेकर मंत्रालय तक की साख को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। कबीरधाम में नियम-कायदों का खुला मखौल उड़ाते हुए 'कुर्सी मोह' का एक ऐसा हैरान करने वाला अध्याय लिखा जा रहा है, जिसे देखकर पूरा प्रशासनिक तंत्र शर्मसार है।


नियम 'कोमा' में, साहब 'मौज' में!


शासकीय सेवा में तीन साल की अवधि पूरी होते ही तबादले का नियम एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन कबीरधाम में ज़िला कार्यक्रम अधिकारी आनंद कुमार तिवारी के मामले में यह नियम पूरी तरह 'कोमा' में चला गया है। 


आरटी आई से कबीरधाम कार्यालय द्वारा जारी पत्र क्रमांक/131/मबावि/सू.के.अ./2026 में जनसूचना अधिकारी ने लिखित में स्वीकार किया है कि आज दिनांक तक शासन से इनके स्थानांतरण का कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। यानी, तीन साल से अधिक की मियाद बीत जाने के बाद भी साहब कबीरधाम की इस मलाईदार कुर्सी पर अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं।

जनता पूछ रही है ये तीखे सवाल?


यह महज़ एक ट्रांसफर न होने का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रशासनिक साठगांठ की बू देता है। आज जनता के ये तीखे सवाल सीधे ज़िला प्रशासन और संबंधित विभाग के सीने पर प्रहार कर रहे हैं:
यह अंधा संरक्षण क्यों?: तीन साल से अधिक का समय बीतने के बाद भी स्थानांतरण आदेश का 'लापता' होना क्या यह साबित नहीं करता कि व्यवस्था के ऊंचे गलियारों से साहब को खुला वरदहस्त प्राप्त है?
नीतियों का सरेआम कत्ल क्यों?: जब आम कर्मचारियों पर ट्रांसफर का चाबुक तुरंत चल जाता है, तो आनंद कुमार तिवारी के कबीरधाम प्रेम के आगे पूरी प्रशासनिक मशीनरी इतनी लाचार और नतमस्तक क्यों दिखाई दे रही है?
क्या कबीरधाम में व्यवस्था बंधक है?: क्या इस पूरे संभाग या प्रदेश में इस पद के योग्य कोई दूसरा अधिकारी नहीं है, या फिर इस कुर्सी के पीछे का 'गणित' कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है?
कबीरधाम कलेक्टर के 'इकबाल' को सीधी चुनौती!
यह सरकारी दस्तावेज़ अब सीधे अपीलीय अधिकारी और कलेक्टर कबीरधाम के टेबल पर पहुंचने वाला है। यह मामला अब सिर्फ एक अधिकारी के जमे रहने का नहीं, बल्कि कबीरधाम ज़िला प्रशासन के 'इकबाल' और उसकी 'पारदर्शिता' की अग्निपरीक्षा का है। क्या कलेक्टर साहब इस रसूखदार 'कुर्सी तंत्र' को हिलाने का साहस दिखाएंगे, या फिर नियमों को ताक पर रखकर इस मेहरबानी को मूक सहमति मिलती रहेगी?
अब देखना यह है कि इस गंभीर खुलासे के बाद क्या प्रशासन अपनी नींद से जागकर स्वयं अपनी साख बचाने के लिए मजबूर होता है, या फिर यह 'कुर्सी का खेल' कबीरधाम की जनता की आँखों में धूल झोंकता रहेगा।

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